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गोवर्धन पूजा: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का संगम l


**गोवर्धन पूजा: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का संगम**

गोवर्धन पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो धार्मिक आस्था, प्राकृतिक संतुलन और वैज्ञानिक महत्व का अनूठा प्रतीक है। दीवाली के अगले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक पौराणिक कथा से नहीं जुड़ा है, बल्कि इसमें हमारे पूर्वजों का प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम और जागरूकता भी छिपी है। गोवर्धन पर्वत के महत्व को भगवान श्रीकृष्ण के प्रेरक संदेशों, कृषि विज्ञान, भूगर्भीय तथ्यों, और पुरातत्व से जोड़कर देखा जाए, तो यह पूजा और भी गहरा अर्थ प्रकट करती है।

*गोवर्धन पर्वत का भूगर्भिक और वैज्ञानिक रहस्य*
गोवर्धन पर्वत का धार्मिक महत्व तो स्पष्ट है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह पर्वत और भी खास है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह पर्वत कभी हिमालय का हिस्सा था और कालांतर में गोकुल क्षेत्र में स्थित हो गया। इसके पत्थरों में पाए जाने वाले खनिज ‘मैलाकाइट’ जैसे तत्व इसे विशिष्ट बनाते हैं। इसके अलावा, गोवर्धन पर्वत का जल संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता में योगदान इस बात को दर्शाता है कि यह क्षेत्र पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

*प्राकृतिक संतुलन और गोवर्धन पूजा का संदेश*
गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है; इसमें छिपा संदेश यह है कि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रदेव की पूजा को छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा प्रारंभ करना यह सिखाता है कि हमारा असली धर्म प्रकृति का सम्मान करना है। कृष्ण ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, जो आज के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के समय और भी प्रासंगिक हो गया है।

*‘अन्नकूट’ पर्व और कृषि विज्ञान का प्रतीक*
गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट पर्व मनाया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के अनाज और सब्जियों का भोग लगाया जाता है। यह पर्व कृषि विज्ञान और धरती के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। गोवर्धन पूजा में अन्नकूट की परंपरा यह प्रतीक है कि धरती से प्राप्त भोजन ही हमारे जीवन का आधार है। इस अवसर पर पकाए जाने वाले व्यंजन हमारे पूर्वजों के प्रकृति के प्रति आभार और कृषि का सम्मान दर्शाते हैं, जो इस पर्व को वैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष बनाते हैं।

*गोवर्धन पूजा: भगवान कृष्ण का पर्यावरणीय संविधान*
भगवान श्रीकृष्ण का गोवर्धन पूजा का संदेश केवल धर्म का पालन नहीं, बल्कि एक प्रकार से समाज के लिए एक पर्यावरणीय ‘संविधान’ भी था। उन्होंने अपने समय के समाज को यह सिखाया कि प्राकृतिक संसाधनों का आदर करना अत्यंत आवश्यक है। यह आज भी एक प्रेरणास्रोत है, जिससे हमें सिखने को मिलता है कि प्रकृति की सुरक्षा और संतुलन को बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

*पुरातात्विक अवशेषों का ऐतिहासिक महत्व*
गोवर्धन पर्वत के आसपास के प्राचीन मंदिर और मूर्तियाँ इस पर्व की प्राचीनता को सिद्ध करते हैं। इन अवशेषों से स्पष्ट होता है कि यह परंपरा हमारे पूर्वजों के समय से चली आ रही है और इसमें हमारे इतिहास और संस्कृति का संरक्षण समाहित है। गोवर्धन पूजा इस सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का भी एक माध्यम है।

*गोवर्धन पूजा* केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आदर, जैव विविधता के सम्मान और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश हमें प्रेरित करता है कि धर्म का असल उद्देश्य समाज और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना है। गोवर्धन पूजा का हर पहलू – चाहे वह अन्नकूट हो, भूगर्भिक महत्व हो, या पुरातत्व – हमें यह सिखाता है कि हमें प्रकृति का सम्मान करते हुए अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए, जिससे हम आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, स्वस्थ और संतुलित पर्यावरण प्रदान कर सकें।