Ticker

6/recent/ticker-posts

संपादकीय लेख : चुनाव आते ही जागने वाले नेता और दिखावटी विकास की सियासत.


चुनाव आते ही जागने वाले नेता और दिखावटी विकास की सियासत
चुनाव आते ही कई नेता अचानक सक्रिय हो जाते हैं। जो चेहरे वर्षों तक जनता की समस्याओं से दूर रहे, वही चुनावी मौसम में गांव-गांव, गली-गली दिखाई देने लगते हैं। हाथ जोड़कर वादे किए जाते हैं, विकास के बड़े-बड़े दावे होते हैं, लेकिन मतदान खत्म होते ही वही नेता फिर से गायब हो जाते हैं।
चुनाव आते ही जो नेता सक्रिय हो जाते हैं और बाद में गायब, उनका विकास नहीं — सिर्फ़ चुनावी ड्रामा दिखता है। जनता अब वादों से नहीं, काम के हिसाब से वोट देगी।
चुनाव आते ही नेता सक्रिय वैसे गायब, वैसे अपना विकास चुनाव के समय दिखता है जनता का।
ये पंक्तियाँ आज की चुनावी राजनीति की सच्चाई को साफ़ उजागर करती हैं।
आज विकास की परिभाषा बदल दी गई है। कहीं अधूरी सड़क का उद्घाटन, कहीं सालों पुरानी योजना को नया रंग, तो कहीं जनता के पैसों से लगाए गए पोस्टरों में विकास की तस्वीर दिखाई जाती है। असल सवाल यह है कि क्या चुनाव के बाद भी वही सक्रियता बनी रहती है? ज़्यादातर मामलों में जवाब साफ़ है—नहीं।
ग्रामीण इलाकों में आज भी पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार जैसी बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। लेकिन चुनाव आते ही इन्हीं मुद्दों को हथियार बनाकर वोट मांगे जाते हैं। जनता की मजबूरी को राजनीतिक लाभ में बदला जाता है।
नेता चुनाव से पहले जनता की चौखट पर पहुंचते हैं, लेकिन जीत के बाद वही जनता कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हो जाती है। जो प्रतिनिधि पाँच साल तक जनता के बीच नहीं रहे, वे अचानक चुनाव के समय जनसेवक बनने का नाटक करते हैं।
अब हालात बदल रहे हैं। जनता पहले से ज़्यादा जागरूक है। सोशल मीडिया, स्थानीय न्यूज़ और ज़मीनी हकीकत ने लोगों को समझा दिया है कि कौन नेता सिर्फ़ भाषण देता है और कौन वास्तव में काम करता है।
अब सवाल पूछे जा रहे हैं—
पिछले कार्यकाल में क्या किया?
विकास कागज़ों में हुआ या ज़मीन पर?
आज ज़रूरत है ऐसे नेताओं को मुंहतोड़ जवाब देने की, जो सिर्फ़ चुनाव के समय जनता को याद करते हैं। वोट अब भावनाओं पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और काम की रिपोर्ट कार्ड पर मिलेगा।
निष्कर्ष
लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है। जब जनता दिखावटी विकास और असली काम में फर्क करेगी, तभी चुनावी सियासत बदलेगी।
अब चुनाव केवल जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि गायब रहने वाले नेताओं से हिसाब लेने का समय है।

Post a Comment

0 Comments